विश्व कप 2019: दूसरी टीमों के खेल बिगाड़ रही है ये '11वीं टीम'

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- Author, दिनेश उप्रेती
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इंग्लैंड की मेजबानी में क्रिकेट का महाकुंभ शुरू हुए एक पखवाड़े से अधिक का समय हो गया है. टूर्नामेंट में आधिकारिक तौर पर दस टीमें हिस्सा ले रही हैं और प्रारूप के हिसाब से हर टीम को बाकी नौ टीमों से मुक़ाबला करना है.
सुनने-पढ़ने में ये फॉर्मेट काफ़ी दिलचस्प और प्रतिस्पर्धी है, यानी अब शायद ही किसी क्रिकेटप्रेमी के पास ये कहने का मौका हो कि इस पूल में तो हल्की टीमें थी या फिर ये 'ग्रुप ऑफ़ डेथ' था. लेकिन इस टूर्नामेंट भी ये विलेन आ गया है. ऐसा विलेन जिसे टूर्नामेंट में शामिल टीमें तो परेशान हैं ही, दुनिया के कोने-कोने से इंग्लैंड पहुँचे लाखों क्रिकेटप्रेमी भी निराश हैं.
जी हाँ बात हो रही है टूर्नामेंट की अनचाही टीम बारिश की जो टूर्नामेंट में बेहद अहम भूमिका निभा रही है.
लोग सवाल उठाने लगे हैं
सबको मौसम की जानकारी थी, फिर वर्ल्ड कप के लिए इंग्लैंड को क्यों चुना गया?
बारिश की इतनी संभावना है तो फिर रिज़र्व डे क्यों नहीं रखा गया?
इस टूर्नामेंट में क्यों बर्बाद किया जा रहा है जो चार साल के लंबे इंतज़ार के बाद आता है?
बारिश खलनायक हो सकती है तो ग्राउंड मैनेजमेंट बेहतर क्यों नहीं किया गया?
ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि वर्ल्ड कप में अब तक की विजेता टीम बारिश ही रही है और चार मैच बारिश के कारण नहीं हो सके. गुरुवार को ट्रेंट ब्रिज में भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच मुक़ाबला भी बारिश की भेंट चढ़ गया. ये तीसरा मैच था, जिसमें एक भी गेंद नहीं फेंकी जा सकी.
अब तक दक्षिण अफ्रीका बनाम वेस्ट इंडीज़, श्रीलंका बनाम पाकिस्तान, श्रीलंका बनाम बांग्लादेश और भारत बनाम न्यूज़ीलैंड के मैच बारिश में धुल चुके हैं.
विश्व कप के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ जब इतनी बड़ी तादाद में बारिश ने अपना असर दिखाया हो. इससे पहले 1992 और 2003 के विश्व कप में दो-दो मैच बारिश के कारण नहीं खेले जा सके थे.
कुल मिलाकर इससे पहले खेले गए 11 विश्व कप में 400 से अधिक मुक़ाबलों में सिर्फ़ नौ मैचों में ही बारिश ने रंग में भंग डाला है और मैचों का निर्णय नहीं निकल पाने से टीमों में बराबर अंक बांट दिए गए.
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ऐसा नहीं है कि टूर्नामेंट के लिए मौसम को लेकर अगर-मगर अब बंद हो जाएंगे, बल्कि संभावना तो ये भी है कि अभी कुछ और मैचों में बारिश खलनायक बन सकती है और मोटा पैसा खर्च कर इंग्लैंड पहुँच दर्शकों का मज़ा किरकरा हो सकता है.
ऐसे में बारिश से निराश और मायूस दर्शक कुछ समाधान सुझा रहे हैं, लेकिन क्या वाकई ये व्यावहारिक हैं.
छत बना दी जाए

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कुछ दर्शकों का कहना है कि क्यों न विंबलडन के सेंटर कोर्ट की तरह स्टेडियम की अस्थाई छत बना दी जाए यानी जब बारिश हो तो इसे खींच दिया जाए. साल 2009 में विंबलडन के सेंटर कोर्ट में अस्थाई छत लगाई गई थी.
लेकिन ये इतना आसान नहीं है क्रिकेट मैदान के ऊपर छत बनाना बेहद जटिल काम है और बहुत ही खर्चीला. टेनिस स्टेडियम कमोबेश छोटे होते हैं, लेकिन क्रिकेट स्टेडियम दर्शकों की क्षमता और मैदान के हिसाब से खासे बड़े होते हैं.
माना जाता है कि विंबलडन में अस्थाई छत बनाने पर तकरीबन 7 से 10 करोड़ पाउंड का खर्च आया, और हाँ ये बताने की ज़रूरत नहीं कि हरी घास पर होने वाले इस टूर्नामेंट के सभी मैच इसी जगह खेले जाते हैं.
यानी विश्व कप क्रिकेट में उन सभी 11 स्टेडियमों पर अस्थाई छत बनाना व्यावहारिक नहीं है, जहाँ इस टूर्नामेंट में मैच खेले जा रहे हैं. और ऐसा करने के लिए स्टेडियम के ढाँचे में भी बदलाव करना ज़रूरी होगा.
मैदान को प्लास्टिस शीट से ढँकें

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अगर आपको इंग्लैंड का पिछला श्रीलंका दौरा याद हो तो वो तस्वीरें अभी तक आपके ज़ेहन में होंगी जब भी बारिश आती थी ग्राउंडस्टाफ तेज़ी से कवर लेकर ग्राउंड की तरफ़ भागते थे और कुछ मिनटों में पूरे ग्राउंड को कवर कर दिया जाता था.
इसका फ़ायदा ये होता था कि विकेट तो सुरक्षित रहता था मैदान पर भी गीली जगह नहीं रहती थी और नतीजा ये होता था कि जैसे ही बारिश रुकती थी अंपायरों के लिए मैच शुरू करने का फ़ैसला लेना आसान होता था.
भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच ट्रेंट ब्रिज में मैच इसीलिए नहीं हो सका क्योंकि मैदान गीला था और इसे सुखाने की व्यवस्था नहीं थी.
इस व्यवस्था में सबसे अधिक ज़रूरत है ग्राउंडस्टाफ की. इस काम में बड़ी संख्या में ग्राउंडस्टाफ़ तैनात की आवश्यकता होगी और इंग्लैंड में इतने कर्मचारियों की नियुक्ति करने का बजट बहुत अधिक होगा.
ऐसा नहीं कि इंग्लैंड में ये प्रयोग नहीं किए गए, एजबेस्टन में 1981 से साल 2001 तक 'ब्रम्बरेला' का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन ईसीबी ने पाया कि इससे पसीना और अधिक आता है, विकेट में नमी बढ़ जाती है और इ पर बल्लेबाज़ी करना ख़ासा मुश्किल हो जाता है.
रिज़र्व दिन क्यों नहीं

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पिछली बार जब इंग्लैंड ने 1999 में क्रिकेट विश्व कप की मेज़बानी की थी, तब मैचों के लिए सुरक्षित दिन रखे गए थे. लेकिन इस बार ग्रुप स्टेज के मुक़ाबलों के लिए रिज़र्व डे नहीं रखा गया है, सिर्फ़ सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल मुक़ाबलों के लिए रिज़र्व डे रखा गया है.
श्रीलंका के ख़िलाफ़ बारिश से मैच रद्द होने के बाद बांग्लादेश के कोच स्टीव रोड्स ने पूछा था, "हम जब चांद पर आदमी भेज सकते हैं तो फिर रिज़र्व डे क्यों नहीं रख सकते?"
इस बवाल पर सफाई देने के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी को भी आगे आने पड़ा,. आईसीसी के मुख्य कार्यकारी डेविड रिचर्डसन ने रिज़र्व डे पर कहा, "ऐसा करना बेहद जटिल होता और इससे टूर्नामेंट काफी लंबा खिंच जाता."
इसके अलावा, बारिश से किसी एक टीम को फ़ायदा होने की बात भी कही जा रही है.
बारिश से खेल के हालात नाटकीय रूप से बदल जाते हैं और किसी एक टीम को फ़ायदा पहुँच रहा है. गेंदबाज़ों के लिए गेंद पर पकड़ बनाना ख़ासा मुश्किल हो जाता है और फिसलन भले मैदान पर फ़ील्डिंग करना भी आसान नहीं होता.
इंग्लैंड और वेल्स को मेजबानी न मिले?

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तो इसका जवाब तो ये है कि महाशय बारिश तो दूसरे महाद्वीपों में भी होती है. क्या ऐसा नहीं है?
तो सिर्फ़ इसलिए किसी देश को मेजबानी से वंचित नहीं किया जा सकता कि वहाँ बारिश आने की संभावना बहुत अधिक है. ऐसा भी कहा जा रहा है कि पिछले हफ्ते इंग्लैंड में अनुमान से अधिक बारिश भी हुई है. 48 घंटों में 100 मिलीमीटर बारिश.....इसे इंग्लैंड में जून के महीने के लिए असामान्य ही कहा जाएगा.
असल में ब्रिस्टल और साउथैम्पटन में सामान्य तौर पर इतनी बारिश नहीं होती, लेकिन इस बार इतनी हुई कि मैच नहीं हो सके. पिछले साल यहाँ जून के महीने में सिर्फ़ 2 मिलीमीटर बारिश हुई थी और मौसम सुहावना और चटक धूप वाला था.
इसे किस्मत भी कहा जा सकता है. अगर आपका एक मैच सोमवार को ब्रिस्टल में होता और मंगलवार को साउथैम्पन में तो दोनों ही मैचों में नतीजे देखने को मिलते.
अगले मैचों में बारिश का कितना साया?
15 जून- श्रीलंका बनाम ऑस्ट्रेलिया, साउथैम्पन- बारिश की संभावना नहीं
15 जून- दक्षिण अफ्रीका बनाम अफ़ग़ानिस्तान, कार्डिफ़- बारिश की संभावना
16 जून- भारत बनाम पाकिस्तान, ओल्ड ट्रैफर्ड- दोपहर के बाद हल्की बारिश
17 जून- वेस्ट इंडीज़, बनाम बांग्लादेश, टॉन्टन- बारिश की संभावना नहीं
18 जून- इंग्लैंड बनाम अफ़ग़ानिस्तान, ओल्ड ट्रैफर्ड- बारिश की कम संभावना
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