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जिन्ना पर उठा विवाद बेमानी: डॉ. हसन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के प्रमुख इतिहासकार और दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया (विश्वविद्यालय) के कुलपति डॉ. मुशीरुल हसन ने पाकिस्तान के क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताने के लिए लालकृष्ण आडवाणी की आलोचना की है. बीबीसी हिंदी सेवा के साप्ताहिक कार्यक्रम 'आपकी बात-बीबीसी के साथ' में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने जिन्ना को लेकर छिड़ी सारी बहस को ही बेमानी क़रार दिया. डॉ. हसन ने कहा, "मैं नहीं समझ पा रहा कि ये बहस इस समय क्यों छिड़ी है. यदि विभाजन के छह दशक बाद किसी की धर्मनिरपेक्षता पर बहस शुरू की जाती है तो हमें नहीं लगता कि ऐसे सवाल का जवाब देना संभव है." आडवाणी के बयान के मक़सद के बारे में उन्होंने कहा, "आडवाणी के बयान की सच्चाई के बारे में राय देने के लिए हमें लंबे समय तक इंतज़ार करना होगा. मैं न तो ख़ुद समझ पा रहा हूँ न ही किसी को समझा पा रहा हूँ कि आख़िर क्यों और कैसे आडवाणी जी ने अपनी राय (जिन्ना के बारे में) बनाई." सहमत नहीं डॉ. हसन ने दो टूक शब्दों में कहा, "मैं आडवाणी की उस बात से सहमत नहीं हूँ जो उन्होंने पाकिस्तान में कही." उन्होंने कहा कि जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष घोषित करने से पहले 1939 और 1946 के दस्तावेज़ों का अध्ययन किया जाना चाहिए. डॉ. हसन ने भाजपा की धर्मनिरपेक्षता पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा, "आडवाणी ने तो पंडित नेहरू या मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को कभी धर्मनिरपेक्ष नहीं कहा. जब आप अपने देश में कोई धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञ नहीं देख पाते, आप किसी दूसरे देश में ऐसा कैसे कर सकते हैं?" कार्यक्रम में कराची स्थित क़ायदे आज़म अकादमी के निदेशक प्रोफ़ेसर शरीफ़उल मुजाहिद ने भी भाग लिया. उन्होंने कहा कि जिन्ना ख़ुद किसी विचाराधारा विशेष से बँधना नहीं चाहते थे. प्रोफ़ेसर मुजाहिद ने आडवाणी के बयान को भारत-पाकिस्तान शांति प्रक्रिया को भाजपा के समर्थन के रूप में देखे जाने पर ज़ोर दिया. |
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