यूपी की रामपुर विधानसभा सीट जीतने वाले पहले हिंदू उम्मीदवार कौन हैं?

    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"आज़म ख़ान ने यहां के मुसलमानों को अपना गुलाम समझा, उनके प्यार की कद्र नहीं की, लेकिन आज पचास साल पुरानी अंधेरी रात को यहां के मुसलमानों ने खत्म कर दिया है. उन्होंने खुद को योगी आदित्यनाथ की सरकार में सुरक्षित समझा है."

ये शब्द बीबीसी हिंदी से बात करते हुए उत्तर प्रदेश की रामपुर विधानसभा उपचुनाव में चुने गए आकाश सक्सेना ने कहे हैं.

आकाश सक्सेना ने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीति के सबसे बड़े चेहरे आजम ख़ान के गढ़ रामपुर में न सिर्फ सेंधमारी की है बल्कि उसे ढहा दिया है.

आजाद भारत के इतिहास में पहली बार इस सीट पर कोई गैर-मुस्लिम और गैर-पठान उम्मीदवार चुना गया है.

10 बार रामपुर के विधायक, एक बार के सांसद, उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के साथ कई भारी भरकम विभागों को एक समय संभालने वाले आजम ख़ान की मार्मिक अपीलों को जनता ने इस बार खारिज कर दिया.

यही वजह है कि गुजरात और हिमाचल के चुनाव नतीजों के बीच भी रामपुर के उपचुनाव पर हर किसी की नजरें टिकी थीं. पीएम मोदी तक, नतीजों के बाद दिए अपने भाषण में रामपुर की जीत का जिक्र करना नहीं भूले.

लेकिन इस जीत के नायक आकाश सक्सेना के बारे में हम कितना जानते हैं? वे क्या करते हैं? आजम ख़ान के खिलाफ उनकी लड़ाई कब शुरू हुई? कैसे वे रामपुर में आजम ख़ान के खिलाफ विरोध की आवाज बने? कैसे उन्होंने आजम ख़ान को सलाखों के पीछे भेजा?

इन सब पर बात करने से पहले एक नजर उत्तर प्रदेश में रामपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों पर.

हेट स्पीच मामले में रामपुर की एक अदालत ने समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम को तीन साल की सजा सुनाई थी, जिसके चलते उन्हें अपनी विधायकी से हाथ धोना पड़ा.

रामपुर विधानसभा सीट खाली होने के बाद उपचुनाव हुआ, जिसमें आजम ख़ान समर्थित समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आसिम राजा को करीब 47 हजार और बीजेपी के उम्मीदवार आकाश सक्सेना को करीब 81 हजार वोट मिले.

कौन हैं आकाश सक्सेना

आकाश सक्सेना राजनीतिक परिवार से आते हैं. उनके पिता शिव बहादुर सक्सेना उत्तर प्रदेश में चार बार विधायक रहे हैं. वे कल्याण सिंह, राम प्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह की सरकार में मंत्री रहे हैं.

रामपुर में आकाश सक्सेना का जन्म 14 नवंबर 1975 को हुआ. उन्होंने पांचवी तक की पढ़ाई शहर में फूटा महल के सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल से की. उसके बाद दसवीं तक हरि जूनियर हाई स्कूल में रहे. उन्होंने क्लास ग्यारह और बारह सुंदर लाल इंटर कॉलेज से की.

बीबीसी हिंदी से बात करते हुए उन्होंने बताया, "12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं अपने पिता के साथ सामाजिक कामों और संघ की गतिविधियों में लग गया. पिता पहली बार 1989 में विधायक बने तो उनके चुनाव को बारीक से देखा और तभी से उनके लिए चुनावों की प्लानिंग करनी शुरू कर दी थी."

सक्सेना के मुताबिक उनकी शादी 1999 में गुंजन सक्सेना से हुई. परिवार में दो बेटियां हैं, जिसमें से एक की शादी हो गई है और दूसरी दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में पढ़ाई कर रही है.

आकाश सक्सेना का एक भाई नौकरी तो दूसरा भाई बिजनेस में है. आकाश सक्सेना, अपनी फैक्ट्री चलाते हैं जिसमें वे डिस्टलरी बिजनेस में काम आने वाला सामान बनाते हैं, इसमें बोतल, डब्बे और ढक्कन जैसी चीज़ें शामिल हैं. इसे एक्सपोर्ट भी किया जाता है.

सक्सेना परिवार का राजनीति में उदय

आकाश सक्सेना के पिता रामपुर की मुस्लिम बहुल स्वार विधानसभा सीट से चुनकर आते थे. रामपुर में पिछले दो दशकों से पत्रकारिता कर रहे तमकीन फ़य्याज़ बताते हैं कि एक ही समय पर शिव बहादुर सक्सेना और आजम ख़ान ने अपनी राजनीति शुरू की.

फ़य्याज़ बताते हैं, "रामपुर की राजनीति में आजादी के बाद नवाबों का वर्चस्व था. इमरजेंसी के बाद शिव बहादुर सक्सेना ने रामपुर देहात में और आज़म खान ने रामपुर नगर में अपनी राजनीति शुरू की. दोनों में फर्क ये था कि एक हिंदू कट्टरवाद की धुरी थे और दूसरे मुस्लिम कट्टरवाद की. दोनों के आने के बाद ही इलाके में हिंदू-मुस्लिम राजनीति की शुरुआत हुई."

1989 से 1996 तक शिव बहादुर स्वार सीट से विधायक रहे, इसके बाद इस सीट पर नवाब परिवार चुनाव लड़ने के लिए पहुंचा.

फ़य्याज़ कहते हैं, "नवाब परिवार की छवि सेक्युलर थी जिसके चलते नवाब काज़िम अली ख़ान दस साल यानी 2012 तक कांग्रेस की टिकट पर चुनकर आते रहे."

इसी बीच शिव बहादुर सक्सेना का बीजेपी से मोहभंग होने लगा था. रामपुर से ऑल इंडिया रेडियो के संवाददाता शन्नू ख़ान बताते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब आकाश सक्सेना के पिता ने विरोध में भाजपा का झंडा तक जलाया था.

वे बताते हैं, "मुख्तार अब्बास नकवी के रामपुर की राजनीति में कदम रखने पर शिव बहादुर सक्सेना का वर्चस्व टूटा और वे बीजेपी से दूर होने लगे, हालांकि अब दोनों एक साथ आ गए हैं."

आज़म के खिलाफ विरोध की आवाज बने आकाश

2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पहली बार आकाश सक्सेना को रामपुर से टिकट दी. उस समय उनका मुकाबला आजम ख़ान से था. उन्हें करीब 55 हजार मतों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा.

वहीं आठ महीने बाद हुए उपचुनावों में करीब 34 हजार मतों से आकाश सक्सेना ने आजम ख़ान के वर्चस्व को तोड़ दिया.

लेकिन आकाश सक्सेना के संघर्ष की कहानी साल दो साल पुरानी नहीं है. उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल कहते हैं कि आजम ख़ान के खिलाफ रामपुर में जो कानूनी लड़ाई लड़ी गई उसके केंद्र में आकाश सक्सेना ही थे.

बृजेश शुक्ल बताते हैं, "रामपुर में आजम ख़ान अपने विरोधियों को एक-एक कर किनारे लगाते जा रहे थे. सपा सरकार के समय इनमें से कई लोगों को जेल भेजा गया, उनके सामने कोई नहीं टिक पाया, लेकिन आकाश सक्सेना वो एक शख्स है जो कानून भी जानते थे और लड़ाई लड़ना भी. यही वजह थी, जिसके चलते बीजेपी को विश्वास था कि अगर आजम ख़ान के खिलाफ कोई चेहरा हो सकता है तो वह आकाश सक्सेना ही हैं."

आज़म खान की सदस्यता रद्द करवाई

आकाश सक्सेना ही वो व्यक्ति हैं जिनके कारण आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम ख़ान की विधानसभा सदस्यता रद्द हुई है.

आजम ख़ान की सदस्यता 2019 के लोकसभा चुनाव में भड़काऊ भाषण देने और उनके बेटे की सदस्यता चुनाव के समय फर्जी जन्म प्रमाण पत्र देने की वजह से गई है.

बीबीसी से बात करते हुए आकाश सक्सेना कहते हैं, "मेरा सबसे बड़ा शौक कानूनी किताबें पढ़ना है. वकील न होते हुए भी मैं अपने केसों की पैरवी खुद करता हूं. मेरे द्वारा आजम ख़ान पर 85 केस चल रहे हैं, मैं पैरवी के साथ वकीलों की मदद भी करता हूं."

कानूनी लड़ाइयों में आकाश सक्सेना ने अपनी जेब से लाखों रुपये खर्च किए हैं. स्थानीय पत्रकार तमकीन फय्याज़ बताते हैं कि वे आजम ख़ान के खिलाफ लड़ाई का चेहरा बनकर उभरे हैं.

वे बताते हैं, "अगर सुप्रीम कोर्ट में वकील कमजोर पड़ रहा है तो दूसरा वकील लेकर आना, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट से वकीलों को रामपुर कोर्ट में खड़ा करना, आजम ख़ान के खिलाफ सबूत जुटाना, जेब से लाखों रुपये खर्च करना और सजा दिलाने जैसे सब काम आकाश सक्सेना ने किए हैं."

ये लड़ाई आकाश सक्सेना के लिए कितनी मुश्किल रही है इस सवाल के जवाब में बृजेश शुक्ल कहते हैं, "रामपुर में रहकर आजम के खिलाफ मुकदमें दर्ज करवाना और लड़ना, ये कोई छोटी मोटी बात नहीं है. इसको आकाश सक्सेना ने मजबूती से किया है. इस लड़ाई को दिल्ली या लखनऊ में बैठकर महसूस नहीं किया जा सकता है."

कैसे जीता रामपुर का चुनाव

रामपुर विधानसभा मुस्लिम बहुल सीट है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यहां करीब 60 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है.

वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल कहते हैं, "इस सीट पर मुस्लिम निर्णायक वोटर है. 2022 के विधानसभा चुनावों में लोगों को लग रहा था कि समाजवादी पार्टी की सरकार बन सकती हैं ऐसे में आजम खान सरकार में नंबर दो के व्यक्ति हो जाएंगे, इसलिए आठ महीने पहले हुए चुनावों में लोगों ने डर कर आजम ख़ान के खिलाफ वोट नहीं किया था. अब जब योगी सरकार है तो लोगों को लगा कि वे कमजोर हो गए हैं और उनके प्रत्याशी के खिलाफ आकाश सक्सेना को जीतवा दिया."

पिछले 50 सालों से आजम ख़ान रामपुर की राजनीति तय करते आए हैं. रामपुर से बाहर भी उनके चेहरे पर लोग वोट देते हैं, मगर उनकी छवि को लेकर भी लोगों में मतभेद हैं.

पत्रकार शन्नू खाऩ कहते हैं, "आजम ख़ान की छवि शहर को छोड़कर गांव और रामपुर के बाहर अच्छी मानी जाती है. लोग समझते हैं कि उन्हें फंसाया गया है. रामपुर देखने में बहुत अच्छा लगता है लेकिन यहां पर रोजगार और इंडस्ट्री के मामले में कुछ नहीं हुआ. आम शहरी अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. यहां की एवरेज इनकम भी काफी कम है."

रामपुर में इंडस्ट्री को बीजेपी उम्मीदवार आकाश सक्सेना ने अपने चुनाव प्रचार में मुख्य मुद्दा बनाया था. बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं, "एक समय उत्तर प्रदेश के अंदर इंडस्ट्री के मामले में रामपुर का नाम कानपुर के बाद लिया जाता था, लेकिन राजनीतिक फायदे के लिए आजम ख़ान ने इसे बंद करवा के नौजवानों के हाथ में रिक्शा थमा दिया. ये इसलिए किया ताकि नौजवानों के हाथ पैसा न आए क्योंकि पैसा आएगा तो वे दिमाग लगाएंगे और दिमाग लगाया तो उनके पीछे नहीं चलेंगे."

आकाश सक्सेना कहते हैं कि वे फिर से रामपुर को वही इंडस्ट्री का गौरव दिलवाने के लिए काम करेंगे.

क्या पसमांदा मुसलमानों ने वोट किया ?

स्थानीय पत्रकार तमकीन फ़य्याज़ कहते हैं कि रामपुर में करीब तीन लाख वोट हैं, जिसमें से करीब दो लाख 27 हजार मुस्लिम मतदाता हैं. इनमें से भी एक लाख से ऊपर पठान और सैय्यद मुसलमान हैं, बाकि जो बचे उनमें अंसारी, सैफी आ जाते हैं.

पसमांदा मुसलमान वे हैं जो सामाजिक तौर पर पिछड़े हुए हैं. फय्याज़ कहते हैं, "पसमांदा शब्द बीजेपी ने दिया है. खुद आकाश सक्सेना ने कहा है कि यहां सभी पसमांदा हैं. सभी सताए हुए हैं, दबाए हुए हैं, कुचले हुए हैं. इसके साथ जो पठान वोटर आजम ख़ान से नाराज था उन्होंने भी बीजेपी का साथ दिया है."

इसकी एक वजह यह भी है कि जब रामपुर में आजम ख़ान ने यूनिवर्सिटी बनाई तो कई लोगों के घरों को तोड़ा गया.

बृजेश शुक्ल कहते हैं, "पसमांदा इसलिए भी मुखर हुए कि उनके साथ कई बार ज्यादती हुई है. जो उन्होंने यूनिवर्सिटी बनाई वहां तमाम लोगों के मकान उजाड़े गए, ये मुद्दा भी बना, ये बड़ा मुद्दा था. पसमांदा इसलिए सामने आ रहा है कि बहुत बड़ी तादाद में लोग आजम के खिलाफ थे. उन्हें कोई भी नाम दे सकते हैं. आप उन्हें पसमांदा कह सकते हैं, चाहे आजम के खिलाफ उसे एकजुटता का नाम दे सकते हैं."

हालांकि इस राजनीतिक बदलाव के असर का पता तो कुछ समय के बाद ही लगेगा कि रामपुर के लोग आकाश सक्सेना के चुने जाने से कितना खुश हैं, और वे स्थानीय लोगों की समस्याओं को कितना दूर कर पाते हैं.

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