गुजरात में बीजेपी को कोई क्यों नहीं हरा पाता?

    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • गुजरात में बीजेपी रिकॉर्ड सीट जीतते दिख रही है
  • पिछली बार बीजेपी को 99 सीटें मिली थी
  • जबकि कांग्रेस ने 77 सीटों पर जीत हासिल की थी
  • गुजरात विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने भी हाथ आज़माया
  • आम आदमी पार्टी का वोट प्रतिशत तो बढ़ा है, लेकिन उसे सीट बहुत नहीं मिल पाई
  • सबसे ज़्यादा नुक़सान कांग्रेस को होता दिख रहा है
  • बीजेपी गुजरात में इतिहास रचने जा रही है
  • 1985 में माधव सिंह सोलंकी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 149 सीटें जीती थी

गुजरात में चुनाव प्रचार जब शबाब पर था, तब राजकोट में कांग्रेस नेता इंद्रनील राजगुरु के नील रिसॉर्ट के कैंपस में शहर के कुछ वकील आपस में बात कर रहे थे.

उनकी बातचीत में हमलोग भी शामिल हो गए. बातचीत गुजरात विधानसभा चुनाव और नरेंद्र मोदी पर हो रही थी. अनिरुद्ध नथवानी नाम के एक वकील ने कहा कि नरेंद्र मोदी गुजरात के शेर हैं.

इस टिप्पणी के जवाब में गुजरात की एक यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे एक स्टूडेंट ने कहा कि आपके शेर कोई प्रेस कॉन्फ़ेंस क्यों नहीं करते? इस पर नथवानी ने कहा- वो बात ठीक है लेकिन मोदी हैं तो शेर ही.

गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार राजीव शाह कहते हैं कि यह बात केवल अनिरुद्ध नथवानी की ही नहीं है.

राजीव शाह कहते हैं, ''गुजरात का मध्य वर्ग और शहर में रहने वाले लोग मोदी के बारे में अनिरुद्ध नथवानी की तरह ही सोचते हैं. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि मोदी प्रधानमंत्री के तौर पर कड़े सवालों का सामना करें या ना करें. नरेंद्र मोदी गुजरात के मध्य वर्ग और शहरी इलाक़ों में अब भी बहुत लोकप्रिय हैं. बीजेपी की यह जीत मोदी की जीत है न कि बीजेपी की.''

गुजरात में बीजेपी ने इस बार रिकॉर्ड तोड़ जीत हासिल की है. अब तक की सबसे बड़ी जीत 1985 में कांग्रेस ने माधव सिंह सोलंकी के नेतृत्व में हासिल की थी. तब कांग्रेस को 149 सीटों पर जीत मिली थी.

बीजेपी की ऐतिहासिक जीत

इस बार बीजेपी ने सोलंकी के रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया है.

राजीव शाह कहते हैं कि गुजरात के चुनावी नतीजों को लेकर कोई अनिश्चितता की स्थिति नहीं रहती थी.

कांग्रेस के एक बड़े नेता ने कहा था कि शहर की 60 सीटें बीजेपी को मिलती हैं और बाक़ी की 122 सीटों को कांग्रेस और बीजेपी में आधा-आधा बाँट दीजिए. गुजरात का चुनावी नतीजा यही होता है.

लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी भी गुजरात में अपने दमखम के साथ उतरी थी. कांग्रेस के लोग कह रहे थे कि अरविंद केजरीवाल बीजेपी नहीं कांग्रेस को हराने गुजरात आए थे.

बीजेपी भले गुजरात में 1995 से लगातार चुनाव जीत रही है लेकिन कांग्रेस का वोट शेयर 40 फ़ीसदी के आसपास रहता था.

अब तक के रुझानों के अनुसार, कांग्रेस का वोट शेयर 27.3% है और आम आदमी पार्टी का वोट शेयर 12.9%. राजीव शाह कहते हैं कि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के वोट बैंक में ही सेंध लगाई है और बीजेपी को रिकॉर्ड जीत दिलाने में इसकी अहम भूमिका रही.

2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 49.1 प्रतिशत था और इस बार अब तक के रुझानों के मुताबिक़ क़रीब 53 फ़ीसदी वोट मिलता दिख रहा है.

बीजेपी ने 2017 में 49.1 प्रतिशत वोट हासिल कर 99 सीटों पर जीत दर्ज की थी और इस बार 53 फ़ीसदी मतों के साथ 157 से ज़्यादा सीटों पर जीत हासिल करती दिख रही है. क़रीब तीन फ़ीसदी मत बढ़ने की वजह से बीजेपी को इतनी बड़ी जीत मिलती दिख रही है.

तीन फ़ीसदी का चक्कर

पिछली बार कांग्रेस का वोट शेयर 41.4 प्रतिशत था और 77 सीटों पर जीत मिली थी. इस बार कांग्रेस 27 फ़ीसदी मतों के लिए संघर्ष करती दिख रही है.

आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के मतों को जोड़ दें तो लगभग उतना होता है, जितना 2017 में अकेले कांग्रेस को मिला था.

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को सभी 26 सीटों पर जीत मिली थी. बीजेपी का वोट शेयर 62.21 प्रतिशत रहा था. कांग्रेस को 32.11 फ़ीसदी वोट मिला था लेकिन किसी भी लोकसभा सीट पर जीत नहीं मिली थी.

इस लिहाज से कांग्रेस की हार में आम आदमी पार्टी को बड़े विलेन के तौर पर देखा जा रहा है.

सूरत में सोशल साइंस स्टडी सेंटर के प्रोफ़ेसर किरण देसाई कहते हैं, ''1995 से ही कांग्रेस का वोट शेयर 40 फ़ीसदी के आसपास रहा है लेकिन इस बार 30 फ़ीसदी से नीचे रह गया. साफ़ है कि आम आदमी पार्टी ने भी बीजेपी विरोधी वोट में ही सेंध लगाई है. अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी के वोट बैंक में सेंध नहीं लगा पा रहे हैं. हमें सूरत में उम्मीद थी कि कम से कम आप के गुजरात प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया और अल्पेश कथेरिया जीत जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ.''

किरण देसाई कहते हैं, ''इस चुनाव में ज़मीन पर कांग्रेस उस तरह से नहीं दिख रही थी. बीजेपी के बाद आप ही दिख रही थी. लेकिन अरविंद केजरीवाल अभी कांग्रेस को हराने में कामयाब हो रहे हैं पर बीजेपी उनके लिए भी अभी टेढ़ी खीर है. नरेंद्र मोदी के साथ गुजरात का मध्यवर्ग अब भी बहुत ही मज़बूती से जुड़ा है. इसे तोड़ना किसी के लिए भी आसान नहीं है.''

हिन्दुत्व की राजनीति

प्रोफ़ेसर किरण देसाई कहते हैं कि गुजरात की सोसाइटी अब इस बात से परेशान नहीं होती है कि बिलकिस बानो के बलात्कारियों को रिहा कर दिया गया या फिर नरोदा पाटिया में दंगे में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की बेटी को बीजेपी ने टिकट दे दिया.

मनोज कुकरानी 2002 के दंगे में दोषी ठहराए गए थे और उनकी बेटी पायल को बीजेपी ने टिकट दिया था. पायल को यहाँ से बड़ी जीत मिली है. उन्हें कुल 71 फ़ीसदी वोट मिले हैं.

देसाई कहते हैं, ''मोरबी में हादसा हुआ इससे भी वहाँ के लोगों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. यह हादसा बीजेपी का बड़ी नाकामी थी. लेकिन यहाँ भी बीजेपी ही जीत रही है. गुजरात में यह जीत मोदी की है न कि बीजेपी की. अगर बीजेपी को ही मोदी मानते हैं तो यह जीत बीजेपी की है.''

गुजरात की राजनीति पर कई किताब लिख चुके और जेनएयू के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर घनश्याम शाह कहते हैं 2002 के दंगों के बाद गुजरात में हिन्दुत्व की जो हवा बह रही है, वह कमज़ोर नहीं पड़ी है.

प्रोफ़ेसर घनश्याम शाह कहते हैं, ''यह मोदी के अधिनायकवाद और हिन्दुत्व की राजनीति की जीत है. मेरा मानना है कि गुजरात का यह चुनाव ग़ैर-बराबरी का चुनाव था. बीजेपी ने राज्य और केंद्र दोनों की पूरी मशीनरी लगा दी थी. दूसरी तरफ़ कांग्रेस के पास न संगठन, न मशीनरी, न पैसा और न ही नेता. ऐसे में चुनावी नतीजों को लेकर बहुत उम्मीद नहीं कर सकते हैं.''

शहरीकरण का फ़ायदा

घनश्याम शाह कहते हैं, ''गुजरात के लोग महंगाई से परेशान हैं. बेरोज़गारी है लेकिन वोट हिन्दुत्व की राजनीति के पक्ष में जा रहा है. बीजेपी की एंटी मुस्लिम राजनीति को यहाँ के बहुसंख्यक हिन्दुओं ने ख़ारिज नहीं किया है.''

गुजरात में बीजेपी पिछले 27 सालों से क्यों नहीं हार रही है?

गुजरात यूनिवर्सिटी में सोशल साइंस के प्रोफ़ेसर गौरांग जानी कहते हैं, ''गुजरात की कुल सवा छह करोड़ की आबादी में से पौने दो करोड़ प्रदेश के पाँच शहरों अहमदाबाद, बड़ौदा, राजकोट, सूरत और भावनगर में रहती है. इन पाँचों शहरों में बीजेपी बहुत मज़बूत है. 90 के दशक में जब आरक्षण विरोधी आंदोलन गुजरात में ज़ोर पकड़ा था तो बीजेपी ने इन्हीं शहरों को निशाना बनाया था. माधव सिंह सोलंकी के खाम (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुसलमान) गोलबंदी के जवाब में पटेल, बनिया, जैन और ब्राह्मणों को बीजेपी ने एकजुट किया था. इन पाँचों शहरों में इन जातियों का प्रभाव था.''

गौरांग जानी कहते हैं, ''शहर के लोग गाँवों को भी प्रभावित करते हैं क्योंकि कारोबार और शिक्षा पर इनका नियंत्रण होता है. बीजेपी ने जिन जातियों को एकजुट किया वे सामाजिक रूप से बहुत प्रभावशाली थीं. ऐसे में इनका असर गाँवों तक भी पड़ा. गुजरात में आरक्षण विरोधी और हिन्दुत्व की राजनीति के बीच एक संबंध रहा है और बीजेपी ने इसे रणनीति के तहत साधा. मुसलमानों को ख़तरे के रूप में बीजेपी स्थापित करने में कामयाब रही और गुजरात के हिन्दुओं को इसी नैरेटिव के तहत एकजुट किया गया.''

बीजेपी के नहीं हारने की एक वजह गौरांग जानी यह भी बताते हैं कि कांग्रेस के पास गुजरात में ज़मीन से जुड़ा कोई नेता नहीं है. वह कहते हैं, ''गुजरात में एक वक़्त था जब झिन्ना भाई दर्जी जैसे नेता थे लेकिन अभी की कांग्रेस बिल्कुल ख़ाली है.''

आम आदमी पार्टी से कांग्रेस को नुक़सान

आम आदमी पार्टी को लेकर गौरांग जानी कहते हैं कि अभी भले उसने कांग्रेस को नुक़सान पहुँचाया है लेकिन आने वाले समय में वही बीजेपी को चुनौती देगी.

जानी कहते हैं, ''गुजरात की राजनीति लंबे समय से दो दलीय रही लेकिन अब आम आदमी पार्टी ने भी दस्तक दे दी है. आम आदमी पार्टी ने बिजली, पानी और मुफ़्त शिक्षा की बात ज़रूर की थी लेकिन यह पार्टी यहाँ के लिए नई थी इसलिए लोग भरोसा नहीं कर पाए.''

गुजरात में ऐतिहासिक जीत के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों पर निशाना साधते हुए कहा है, ''गुजरात ने हमेशा इतिहास रचने का काम किया है. पिछले दो दशक में मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा ने गुजरात में विकास के सभी रिकॉर्ड तोड़े और आज गुजरात की जनता ने भाजपा को आशीर्वाद देकर जीत के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए.''

अमित शाह ने कहा, ''यह नरेंद्र मोदी जी के विकास मॉडल में जनता के अटूट विश्वास की जीत है. गुजरात ने खोखले वादे, रेवड़ी और तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों को नकार कर विकास और जनकल्याण को चरितार्थ करने वाली नरेंद्र मोदी जी की भाजपा को अभूतपूर्व जनादेश दिया है. इस प्रचंड जीत ने दिखाया है कि हर वर्ग चाहे महिला हो, युवा हो या किसान हो सभी पूरे दिल से भाजपा के साथ हैं.''

विपक्ष के पास कोई ठोस रणनीति नहीं

अमित शाह ने कहा था कि इस बार बीजेपी जीत के सभी रिकॉर्ड को तोड़ देगी और ऐसा ही हुआ. बीजेपी 157 सीटें जीतती दिख रही है. 182 सीटों वाली गुजरात विधानसभा में अब तक ऐसी जीत किसी भी पार्टी को कभी नहीं मिली थी.

गुजरात के चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस प्रदेश में सारे मौक़े ख़ुद ही अपने हाथों से जाने दिए हैं.

पिछली बार कांग्रेस को 77 सीटें मिली थीं और 16 विधायक बीजेपी में चले गए थे. कांग्रेस के आलोचकों का कहना है कि गुजरात में कांग्रेस को लेकर एक छवि बनी है कि वह बीजेपी को हराने में सक्षम नहीं है और यह आम आदमी पार्टी के भविष्य के लिए अच्छी बात है.

घनश्याम शाह कहते हैं कि कांग्रेस के पास बीजेपी की हिन्दुत्व की राजनीति का मुक़ाबला करने के लिए कोई ठोस नैरेटिव नहीं है.

वह कहते हैं, ''बिलकिस बानो के बलात्कारियों को रिहा करने का राहुल गांधी विरोध कर रहे थे लेकिन स्टेट यूनिट ख़ामोश थी. आम आदमी पार्टी भी ख़ामोश थी. बीजेपी ने सभी राजनीतिक पार्टियों को हिन्दुत्व की राजनीति के सामने घुटने के बल ला दिया है."

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